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12 Aug, 2025
पर्यवेक्षणीय तटीय क्षेत्र: दक्षिण एशिया में जलवायु जोखिमों का सामना

By Vaishali Tiwari, AIDMI, India

 

दक्षिण एशिया, अपनी लंबी और घनी आबादी वाली तटीय रेखा के कारण, वैश्विक स्तर पर उन क्षेत्रों में अग्रणी है जो जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के किनारे बसे इस क्षेत्र ने ऐतिहासिक रूप से अनेक विनाशकारी चक्रवातों और तूफानों का सामना किया है, जिसने स्थानीय समुदायों में एक प्रकार का प्राकृतिक लचीलापन विकसित किया है।

हालांकि, वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि, तटीय शहरीकरण में तेजी और पारंपरिक सुरक्षा कवच—जैसे मैंग्रोव वनों—के क्षरण ने तटीय समुदायों की भेद्यता और बढ़ा दी है। अब इस क्षेत्र को सिर्फ प्राकृतिक आपदाओं से नहीं, बल्कि गहराते जलवायु संकट से भी जूझना पड़ रहा है।

 

चक्रवातों का बढ़ता प्रभाव

पिछले दो दशकों में आए प्रमुख चक्रवात—ओडिशा (1999), नरगिस (2008), अम्फान (2020), ताऊते (2021), और बिपरजॉय (2023)—ने न केवल व्यापक जान-माल की हानि की, बल्कि मौजूदा चेतावनी प्रणालियों और आपदा प्रतिक्रिया तंत्र की कमजोरियों को भी उजागर किया। उदाहरण के लिए, ओडिशा का सुपर साइक्लोन लगभग 15,000 जानें ले गया और $4.4 बिलियन का नुकसान पहुंचा गया। वहीं चक्रवात नरगिस ने म्यांमार में 130,000 से अधिक लोगों की जान ली और लगभग $13 बिलियन की आर्थिक क्षति की।

 

अरब सागर में बदलता संतुलन

पारंपरिक रूप से शांत माने जाने वाला अरब सागर अब तीव्र और दीर्घकालिक चक्रवातों का स्रोत बन चुका है। उदाहरणतः, चक्रवात बिपरजॉय 11 दिनों तक सक्रिय रहा और समुद्री ऊष्मा सामग्री की अधिकता ने इसे तीव्र गति से शक्तिशाली श्रेणी 3 चक्रवात में परिवर्तित कर दिया। ताऊते चक्रवात की तीव्रता तो इतनी अधिक थी कि वह केवल 24 घंटों में श्रेणी 1 से श्रेणी 4 में पहुंच गया।

 

तटीय लचीलापन: आवश्यकता और दिशा

इन बदलती परिस्थितियों के बीच, तटीय लचीलापन केवल प्रतिक्रिया देने तक सीमित नहीं रह सकता। यह एक समग्र दृष्टिकोण की मांग करता है जिसमें स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी, वैज्ञानिक नवाचार, नीति समर्थन और क्षेत्रीय सहयोग शामिल हों। तटीय लचीलापन का मूल उद्देश्य यह होना चाहिए कि समुदाय न केवल संकट से सुरक्षित रहें, बल्कि पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में सशक्त रूप से भाग भी लें।

 

समाधान और नवाचार

आज INFLOWS मॉडल जैसे नवाचारों का प्रयोग हो रहा है, जो बाढ़ संभावित क्षेत्रों की भविष्यवाणी के लिए शहरी संरचना और जनसंख्या आंकड़ों का उपयोग करता है। इसी प्रकार, राष्ट्रीय तटरेखा मूल्यांकन प्रणाली द्वारा तैयार किया जा रहा तटरेखा परिवर्तन एटलस तटीय बदलावों की निगरानी में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

साथ ही, तटीय क्षेत्रों में Managed Realignment (नए सुरक्षा रेखा निर्धारण), Move Seaward (समुद्र की ओर ढांचे बनाना), और Limited Interventions (सीमित हस्तक्षेप) जैसे रणनीतिक उपायों का भी उपयोग हो रहा है।

 

सामाजिक समावेशन और भागीदारी

किसी भी रणनीति की सफलता तभी सुनिश्चित हो सकती है जब उसमें समाज के सबसे कमजोर वर्गों की आवाज शामिल हो। महिलाओं, मछुआरों, गरीबों और विकलांग व्यक्तियों को योजना निर्माण में शामिल करना और उनके अनुभवों का उपयोग करना नीतिगत सफलता की कुंजी है।

 

निष्कर्ष

जलवायु संकट का सामना करते हुए तटीय समुदायों का दीर्घकालिक लचीलापन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि हम साझा स्मृति, सामूहिक निर्णय और ज्ञान-विनिमय को केंद्र में रखें। लचीलापन केवल एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया है—जहां समुदाय स्वयं अपने भविष्य के रक्षक बनें।

दक्षिण एशिया के लिए समय की मांग है कि हम पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान को मिलाकर ऐसे तटीय समाधान विकसित करें जो सतत, न्यायपूर्ण और समावेशी हों। इसी के माध्यम से हम एक अधिक सुरक्षित और समृद्ध तटीय भविष्य की नींव रख सकते हैं।

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