
By Mihir R. Bhatt, AIDMI, India
भारत के शहर आज विकास और संकट—दोनों के केंद्र बन चुके हैं। ये आर्थिक प्रगति को गति देते हैं, लेकिन साथ ही बाढ़, प्रदूषण और अत्यधिक गर्मी जैसी आपदाओं से सबसे अधिक प्रभावित भी होते हैं। ऐसे में शहरों की सुरक्षा और संरक्षा को केवल अपराध या क़ानून-व्यवस्था के नजरिये से नहीं, बल्कि जलवायु जोखिम, सामाजिक समावेशन और वित्तीय स्थिरता के दृष्टिकोण से भी समझना होगा।
आपदा जोखिम न्यूनीकरण और जलवायु लचीलापन पर दशकों के अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि भारत को अपने शहरी शासन के ढांचे और सोच को बदलने की आवश्यकता है।
गेटेड कम्युनिटीज़ और नागरिक भागीदारी
गुड़गांव जैसे शहरों में गेटेड कम्युनिटीज़ का विस्तार नागरिकों को सार्वजनिक अवसंरचना की विफलताओं से अलग-थलग कर देता है। लेकिन जैसे ही बाढ़ आती है, यह भ्रम टूट जाता है। गुड़गांव की लगभग 40% आबादी अनौपचारिक बस्तियों या गांवों में रहती है। आप समुदाय को ‘गेट’ कर सकते हैं, लेकिन आप जोखिमों को ‘गेट आउट’ नहीं कर सकते।
नागरिक भागीदारी को वार्ड-स्तरीय मंचों के ज़रिये संस्थागत रूप देना होगा। अहमदाबाद का उदाहरण सामने है, जहाँ समितियों ने नालों, कचरे और हीट वेव योजनाओं में भागीदारी की। नागरिकों की भूमिका केवल योजना तक नहीं बल्कि निगरानी और मूल्यांकन तक होनी चाहिए।
साझेदारी और अर्बन चैलेंज फंड
शहरी शासन में लेन-देन से अधिक साझेदारी की ज़रूरत है। नागरिकों को प्राथमिकताओं में शामिल करना होगा और निजी क्षेत्र—जो पहले से ही 70% शहरी निवेश करता है—को अनुबंधों में जल संरक्षण, समानता और लचीलापन जैसे तत्वों से बाँधना होगा।
अर्बन चैलेंज फंड का स्वागत हैं, लेकिन चेतावनी हैं कि इसका दायरा केवल कॉरपोरेट्स तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसे छोटे उद्यमों, महिला समूहों और स्ट्रीट वेंडर्स तक भी पहुँचना चाहिए। असली परीक्षा यह होगी कि क्या यह संकट के समय सभी को जोड़ पाएगा और उन लोगों को शामिल करेगा जिन्हें अब तक बाहर रखा गया है।
ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी : संभावनाएँ और सीमाएँ
ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी एक दिलचस्प प्रयोग हैं। यह पानी, परिवहन और नालों जैसी एजेंसियों को जोड़ने का प्रयास है। लेकिन वे चेतावनी हैं कि वार्ड-स्तरीय निगरानी के बिना यह केवल एक और भारी संस्था बन जाएगी।
असली एकीकरण का मतलब है ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज दोनों, और इसमें नागरिकों की भागीदारी दोनों स्तरों पर होनी चाहिए। सुरक्षा और संरक्षा को भी एजेंडे का हिस्सा बनाना होगा, क्योंकि शहरी शासन केवल अवसंरचना तक सीमित नहीं, बल्कि सुरक्षित और विश्वसनीय ढांचे का निर्माण भी है।
हीट पैटर्न और असंगठित श्रमिक
AIDMI के अध्ययनों से स्पष्ट है कि असंगठित श्रमिक सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। अहमदाबाद में किए गए सर्वे के अनुसार, गर्मी के चरम दिनों में स्ट्रीट वेंडर्स की आय 20–25% तक गिर जाती है। रिक्शा चालक, निर्माण श्रमिक और सफ़ाई कर्मचारी लंबे समय तक धूप में बिना छांव, पानी या आराम के काम करते हैं।
हीट एक्शन प्लान अब स्कूलों और अस्पतालों तक पहुँचे हैं, लेकिन सवाल है—क्या ये योजनाएँ परिवहन श्रमिकों और बेघर लोगों तक भी पहुँचती हैं?
शहरी जीवन की गुम होती विविधता
शहरों से सड़क पर दिखने वाली विविधता गायब हो रही है। स्ट्रीट वेंडर्स और छोटे व्यापारी लगातार कम हो रहे हैं। कुछ शहरों में इनकी संख्या 40% तक घट गई है।
यह परिस्थिति न केवल सांस्कृतिक बल्कि लचीलापन और सुरक्षा का भी नुकसान हैं। अनुमान है कि शहरी क्षेत्रों में लगभग 30% अनगिने ‘लॉस एंड डैमेज’ को वेंडर्स ही सोख लेते हैं। वे बाढ़ और हीटवेव के दौरान सस्ता भोजन और सामान उपलब्ध कराते हैं, जब औपचारिक प्रणालियाँ विफल हो जाती हैं।
तीन बड़ी चुनौतियाँ
हर शहरी नागरिक को तीन चुनौतियों पर ध्यान देना चाहिए :
निष्कर्ष
विकसित भारत का दृष्टिकोण साफ़ है—शहरी शासन को गेटेड हितों और अभिजात्य योजनाओं से आगे बढ़कर नागरिक-केंद्रित बनाना होगा। विशेष रूप से कमजोर वर्गों को इसमें शामिल करना होगा।
हमारी सुरक्षा और संरक्षा अवसंरचना की दृष्टि को अपने वर्तमान स्वरूप से कहीं आगे जाना होगा। क्या हम भविष्य के जोखिमों के लिए अतीत की अवसंरचना बना रहे हैं? यही असली सवाल है भारत के शहरी भविष्य के सामने।